Tuesday, July 28, 2020

"स्वयं सिद्धा"------" नॉट गुड टच "

कहानी लेखिका -श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल, 4723 /66 P ,विजय चौक ,जे पी नगर ,अधारताल ,जबलपुर ,म. प्र. 284002
प्रस्तुत कथा मेरी स्वरचित है व् कहीं प्रकाशित नहीं हुई है.

                                                                      "स्वयं सिद्धा"------" नॉट गुड टच "

               स्वतंत्रता दिवस पर पुलिस लाइन में बड़ा प्रोग्राम ,शहर की जानी मानी राजनितिक हस्तियां व् एडमिनिस्ट्रेशन मौजूद ,अधिकांश स्कूल्स के सांस्कृतिक आयोजन व् पुलिस परेड लगातार चलते जाते। सही समय झंडा वंदन व् राष्ट्र गान व् आयोजनों का प्रारम्भ ,आज कुछ ज्यादा रौनक व् लोगों की ज्यादा उपस्थिति। पर रखने को जगह नहीं ,दूर तक कतार नजर आती। उपस्थित लोगों में से कुछ को हो पता चला ,आज खास आयोजन होने वाला है। क्या----पुरे सरकारी पंडाल में सजे धजे नन्हे बालक बालिकाओं व लड़कियों की आश्चर्यजनक उपस्थिति। मानो शहर ही उमड़ पड़ा है ,उन बच्चों बच्चियों का जोश बता रहा है कि आज कुछ खास है.
                     का सायरन बजने लगा ,लोग अलर्ट तो हुए पर समझ नहीं आया कि आखिर कहाँ क्या प्रॉब्लम आ गई है. अरे नहीं ये तो ऊपर की सरकारी मशीनरी की हलचल सी है. यहाँ देखने व पुरस्कृत करने आये हैं। पर किसे ,कैसा सस्पेंस ,कहीं जानकारी पर अधिकांश लोगों का जोश देखते बनता है।
शहर की एस पी  महोदया  ने खुद इस ट्रेनिग को संचालित किया है ,शहर ही नहीं आस पास की लड़कियों की नियमित कोचिंग चल रही है। छोटी उम्र के बच्चों की अलग व् बड़े बच्चों के लिए दूसरा समय निर्धारित। आश्चर्य इस बात का है क्योंकि  इसके लिए अधिकांश अभिभावक पुरे जोश खरोश से हिस्सा ले रहे हैं। स्वयं खड़े रहकर अपना समय दे रहे हैं। नन्हे बालक बालिकाएं पूरे मनोयोग से  सीख रहे हैं. साथ ही

लगातार पिछले तीन दिनों से भयंकर बारिश हो रही है , बहुत  दिनों के बाद सूरज के दर्शन हुए है  रोज न्यूज़ दी जा रही है कि शहर के निचले इलाकों में पानी भर गया है। लोगों को बहुत कठिनाइयां आ रहीं है। खजूरी कॉलोनी में पानी भरने से वहां के लोगों को पास के स्कूल में शेल्टर दिया गया गया है। डॉ अंशु को याद आया कि उनकी शीला बाई भी तो वही रहती है  ,कहीं उसको भी कोई प्रॉब्लम न आ गई हो ,वैसे भी तीन -चार दिनों से वो आई नहीं है। आज कुछ मौसम खुला है ,चलकर उसको देख लिया जाये ,इस बहाने चेकिंग भी हो जाएगी व ठीक होगी तो कल से काम पर आने को कह दूंगी ,परेशानी हो रही है। छोटे बच्चों के साथ घर व ऑफिस का काम बड़ा मुश्किल होता है। वे चल पड़ीं उसको देखने। वैसे इसके पहले भी एक दो बार उसके घर तक उसको ड्राप करने आईं हैं. मेन रोड पर तो अनेकों बार कार से छोड़ा है पर आज तो उसका घर ढूंढकर अंदर जाना ही होगा।

उसकी कॉलोनी इतनी बड़ी भी नहीं उसका घर न मिल पाए ,इसी उधेड़बुन में कब उसी रोड पर आ पहुंची ,पता ही न चला। अचानक गाड़ी रोकी उतरकर शीला के घर जाने के लिए एक दो लोग से पता पूछकर जा पहुंची  ।ये क्या उसकी कॉलोनी तो एकदम साफ सुथरी व चारों तरफ चूना डाला हुआ दिखा। एकदम सामने वो भी अपनी बेटी के साथ दिख गई।        स्वच्छ सा घर ,उसकी बेटी दौड़ कर घर में घुस गई.

अपनी मैडम को अपने घर आया देख वो तो ख़ुशी से झूम उठी।  "अरे तुम तो एकदम ठीक ठाक हो और मैं चिंता में रही कि जाने क्या संकट आ पड़ा है तेरे को." 
" नहीं मैडम वो मेरी लड़की का रोका करने को सोचा है  , वो लड़के वाले आ रहे हैं ,एक दो दिन में ,तब तक मेरी बेटी को ही तैयार करती रही , पर वो तो मेरी बात ही नहीं मान  रही उसकी दादी-दादा ,पापा सब समझाकर हार चुके हैं ।
वो व उसके दोनों भाई जिद में अड़े हैं ,अभी हम पढ़ेंगे-पढ़ाएंगे। शादी की तो बात ही नहीं उठती ।"
------"अब हम गरीब ,लड़की जात को कब तक घर रख सकते हैं ,आगे पढाई की सोच ही नहीं-----सकते। कैसे हाथ में लें  इनको."--"साथ ही बेटी भी  जिद में अडी है कि मेरे टीचर्स  ने मुझे दूसरे फील्ड सुझाये हैं , मेरे पास कई ऑप्शन्स हैं ।” “अब स्कूलों में भी इन विद्यार्थियों को उलटे पाठ सिखाने लगे हैं ,बड़ी मुश्किल है ।"
ओह ! कठिन समस्या आन पड़ी  है सुलझाना कठिन हो रहा है ,तुमको " , मैडम बोल उठीं।
 "अच्छा बुलाओ तो तुम्हारे बच्चों को ,मैं भी ट्राई करके देखूं। "
अपनी समस्या ,हड़बड़ी भूल कर वे उसकी उलझन दूर करने को तत्तपर हो उठीं.
"आप बैठो तो सही मेमसाब" ,वो काफी जोश में आकर बोली। विश्वास हो चला कि ये जरूर उन सबको समझा लेंगी।
अब बैठकर कुछ मुस्कुराकर बोलीं ,"आश्चर्य है अभी तक तेरे बच्चों को देखा तक नहीं हमने। "
---- "वो कुछ मौका ही तो नहीं पड़ा न मेमसाब ",
बहुत देर बाद दोनों बेटे बाहर आये ,दोनों की आँखों व चेहरों से ही समझ आ गया कि परेशानी में हैं शायद।
'एक  छोटा ,एक बड़ा भैया है बिटिया का। दोनों की और शै मिली है उसको ,तभी सब जिद में हैं”।
पुनः कटुता भरकर वो  बोल उठी। "कौन उसको नौकरी करनी करानी है और अब सब ओर का माहौल कितना बिगड़ चूका है ,जमाना बिल्कुल ठीक नहीं ,किसी का भरोसा नही”।------
अब अपने घर वो जाये तो हमारी जिम्मेदारी कम हो  "--------
"बेटे अपनी बहना को बुलाओ ,मेरे पास लाओ। "
 "बोलो डॉ आंटी आईं हैं। " उन्होंने सांत्वना दी।
वो किसी से बात नहीं करना चाहती साब न कुछ समझाने का असर पड़ेगा" ,माँ ने पहले ही कह दिया है नौकरी तो करनी नहीं है। काम करना भी पड़ा तो उसके लिए पढाई की नहीं हुनर की जरुरत होती है. कहतीं हैं अब मुझे ही देखो मन मर्जी का काम ,मन भर पैसा। अपने में कौशल होगा तो जाने कहाँ कमा कर खा सकते हैं । पर हमें हमारी लाडो को माँ जैसा काम नहीं करने देना ,कितनी होशियार है ,हमारी पिंकी आपको नहीं मालूम मैडम। "
कहकर दोनों भैया रुआंसे हो गए। आक्रोशित भी लगे।
ओह ! सिचुएशन तो बिगड़ चुकी है ,कैसे भी इनके परिवार को समझाना होगा। लड़की को समझाकर विवाह हेतु तैयार करना ही  होगा. नहीं तो उनको भी अपने काम वाली के नहीं आने से बहुत दिक्कत हो जाएगी । कुछ तो टैक्टिस भिड़ानी होगी। अब इसके बच्चों को कैसे विश्वास में लिया जाये।
"ओ के पहले यहाँ मेरे पास तो लाओ ,मैं देखती हूँ ,कैसे क्या किया जाये।" डॉ अंशु ने कहा ,
"मैडमजी मेरी पढाई माँ पिताजी ने पहिले ही काम के चक्कर में बंद करवा दी है ,रोजनदारी से कितना कमा पाउँगा।"
 माँ ने कह दिया है तेरे पैसे की हमें जरुरत नहीं ,तुम हमारे काम में रोड़ा नहीं डालो , तुम पर कोई बोझ नहीं होगा।
हाँ मुझे तो छोटे दोनों को उनके ठौर लगाने की बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त होना है। छोटू एकाध साल और पढ़ ले अपनी मेट्रिक निकाल ले, उसकी पढाई बंद ।  लड़की की शादी करूँ गंगा नहाऊं ,वहां जाकर जो करना है करती रहे।
" माँ मुझसे पैसा नहीं लेने का धौंस जमा रहीं है , अब मैने ठान लिया है ,उन दोनों की पढाई व कॅरिअर की रेस्पोंसिबिलिटी है मेरी। मैं और मेहनत करूँगा। उन दोनों को उनके सपने पूरे करने के अवसर देने चाहता हूं।”
" ठीक है , देखो बेटे हम पहिले ही कह चुके हैं ,बात बिगड़ने नहीं देंगे। एक बार बुलाओ तो सही ,तुम्हारी लाड़ो का पक्ष भी सुनूं ,वैसे मुझे कोई फैसला नहीं लेना है।" समझाते हुए कहा उन्होंने। मन ही मन विचार किया कुछ भी  टैक्टिस  लगाकर इन बच्चों को तैयार करना ही होगा। नहीं तो शीला के बिना उनको कितनी प्रॉब्लम हैं ।
जाने क्या सोचकर वो अंदर गया ,
तब तक वे शीला के घर का निरीक्षण करने लगीं। छोटे छोटे,बेहद साफ सुथरे कमरे व चारों तरफ की दीवार पर बने बड़े सूंदर 'भित्तिचित्र '- जो आजकल तो कहीं  देखने ही नहीं मिलते ,किसी म्यूजियम में अवश्य दृष्टिगत होते हैं. यही नहीं जमीन पर भी सूंदर पेंटिंग सी चित्रकारी ,वो अपनी मेड के घर में बनी इस कारीगरी से कोई तारतम्य नहीं बिठाल पा रहीं व सोचने  लगीं कि ये सब ---- ? तभी ----
बेहद नाजुक सूंदर नन्ही मुन्नी सी बच्ची को लेकर वो आया ,"अरे ! तुम वे तो उसे देखकर आश्चर्य से भर उठीं। तुम शीला की बेटी हो। " उसने सकुचाकर उनको देखा व बड़ी ही गरिमा से आगे आकर डॉ अंशु के चरण  छूने चाहे
"नहीं नहीं बेटी अपने यहाँ बेटियां पैर नहीं छुआ करतीं।"
अब तो वे भी दंग हो गईं। ये लड़की उनकी शीला की बेटी है ओह ! अनजाने में वे क्या कर बैठती । 
पीछे पीछे शीला भी मुंह फुलाकर आ खड़ी हुई।
"तुम्हारी बिटिया की क्या उम्र है ?"------- "अरे मैडम अभी पंद्रह पूरा कर चुकी है ,सोलह में चल रही है ,बात लगते चलते अठारह तक हो ही जाएगी ,बालिग होने के पहले नहीं करुँगी। उसका ब्याह ,पर ठीक ठाक घर परिवार तो देखना होगा न।”
चलिए आप दोनों बात करें ,इनके दिमाग में कुछ ---सही” । कटुता से उस बच्ची की माँ ने  कहा।
मैं आती हूँ मैडम ,कुछ चाय नाश्ता का इंतजाम करके। शायद उन दोनों को बातें करने का समय देकर अभी तक तो अंशु केवल अपने स्वार्थ के लिए सोचती रही पर अब धर्म संकट ही आन पड़ा हो जैसे।ये लड़की तो उनकी बिटिया से कुछ ही बड़ी लगती है वो भी निपुणता में किसी से कम नहीं। और यहां तो ग़रीबी का भी उतना बड़ा मुद्दा नहीं लग रहा। तब----
बेटी तुम्हारा नाम , “मैं सोनी हूँ मेम ,मुश्किल ये है अभी कुछ दिनों पहिले तक ही मां कहतीं थीं ,तुझे खूब पढ़ाऊंगी-बढाऊंगी। अब एकदम शादी के
लिए पीछे पड़ गईं हैं।” वो शांत बच्ची एकदम फफककर रो पड़ी।
डॉ अंशु का मन द्रवित हो गया ,ऐसा परिवर्तन अचानक क्यों हो गया बेटा।कोई तो कारण है ।देखो मुझे बताओगी तो सम्भवतः कुछ हेल्प कर सकूं। “आंटीजी बात ही ऐसी है कि कैसे बताऊं ,घर में भी शायद दादी को ही पता है। भाई लोगों को कुछ अंदाज है ।” ” मुझे बता सकती हो ,इतना भरोसा तो करना ही होगा ,जो भी हो ,जैसी भी बात हो बताओ।”
नजर झुकाकर झिझकते हुए बोली ,” पिताजी - माँ तो काम पर चली जाती हैं ,भाई अपने कार्य व पढ़ाई में ।मेरा स्कूल थोड़ी देर में लगता है व लौटते पांच हो जाता है ,तब  ----” “हां बोलो बताओ बिटिया”
---“कुछ लड़के रोज परेशान करते हैं ,पीछे भी कभी आ जाते हैं । उनमें एक तो रिश्ते में भी कुछ लगता है ,अक्सर हमारे घर आ धमकता है ---और ----और----गलत हरकतें करने की कोशिश करता है। तब माँ तो घर में होतीं नहीं न किसको बताऊँ। मेरे व सहेलियों के विरोध करने पर ,हमें व परिवार को देख लेने की धमकी। माँ को थोड़ा थोड़ा बताया है मां तो बहुत चिंता में हो गई है। उनको तो अब किसी पर भी भरोसा ही नहीं। ”
" पर अब क्या इन सबसे डरकर हमारे पास केवल शादी का उपाय रह गया।"
डॉ अंशु के मन में भी चिंतन मनन होने लगा ,प्रगट में कुछ न कह सकी। आज ये बच्ची  ,कल दूसरी ,कभी उनकी बिटिया भी इस तरह की मानसिकता वाले लोगों के कारण संकट में आ सकतीं हैं।पर इसका उपाय ये तो कतई नहीं जो ये शीला सोचने लगी है।अभी तक अपने स्वार्थ सिद्ध में प्रयासरत वे सब बेटियों की सुरक्षा को मन में चिंतित हो चलीं।
ऊपर से तटस्थ रहते हुए पूछ बैठीं ,”ये तो बताओ कि तुम्हारे घर में ये बड़ी बड़ी चित्रकारी किसने की व कहाँ से आई व फर्श की पेन्टिंग्स। “
“”आंटीजी ये तो मुझे मेरे पापाजी ने सीखा दी है ,उनके पास इस तरह की बहुत आर्ट बुक्स हैं ,कभी भाई लोग भी सहयोग कर देते हैं । “ बड़ी उत्सुकता से खुश होकर बोली । इतनी देर बाद उसके चेहरे की मायूसी कम होकर खुशी झलकी।
अच्छा तभी वो तुम्हारे स्कूल के ड्राइंग कम्पटीशन में तुमने बहुत सुंदर कलाकृति बनाई थी। “
वे दोनों कुछ और बात करतीं की शीला आ गई।
कहाँ  से बात शुरू की जाये ताकि शीला गलत न समझकर गहन समस्या का हल सोचे व् उनको भी गलत न सोचकर निदान सोचे. .
क्योंकि वास्तव में ये बड़ी कठिनाई है। घातक सामाजिक बुराई है जो अपने घरों से बढ़कर दूर तक फ़ैल रही है. ये सभी पेरेंट्स के लिए चैलेंज है.
जो हमारी बेटियां थोड़ी बड़ी हो गईं हैं ,वे तो कुछ सावधान कर सकते है उनको , पर जो बहुत छोटी हैं उन्हें व् हमारे नन्हे बालकों को भी एलर्ट करने की जरूरत है. इसके लिए हमें ही उपाय सोचकर मानसिकता ही परिवर्तित करनी है। समाज के हर वर्ग के परिवार के  छोटे बालक बालिकाएं दोनों को ही पारिवारिक संरक्षण के आलावा सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता है. जहाँ वे नन्हे मुन्ने भी अपने साथ सही गलत व्यवहार करने वाले को समझकर सुरक्षित बने रहें। साथ ही उनकी अपनी योग्यता को निखार के निश्चिन्ता से आगे बढ़ सकें ,भयभीत होकर इस बच्ची की तरह अपने जीवन से भटकाव न होने पाए।
उनको स्मरण हो आया ,अभी तीन महीने पहिले  जब वे अपने टीम के साथ देवताल के दिव्यांग -आँख से न देख सकने वाली बालिकाओं के स्कूल में शिक्षण सामग्री बाँटने गईं तो उस ऑफिस में उपस्थित  सारे अधिकारी ,कर्मचारी पुरुष वर्ग मिला ,एक दो महिलाओं की मात्र उपस्थिति।  और वे बच्चिया काफी डरी सहमी सी क्यों लगीं। कहीं उनके साथ कोई अत्याचार या दुर्व्यवहार तो नहीं ------ओह ! सोचकर दिल दहल गया.
 उनके माँ पिता ने अपना बोझ हल्का करने उनको यहाँ रख दिया ,साथ ही  सरकारी अनुदान मिलने से पारिवारिक सहूलियत मिल गई। अब वो बच्ची तो धीरे से उनको बता गई ,ये बेटियां किसे व् कैसे कौन से अपना मन खोल पाएंगी। और तभी मन में  लक्ष्य बना लिया कि अपनी इस मुहीम में अपनी कुछ खास सहयोगियों को लेकर निदान करना होगा।
जुट पड़ीं हैं डॉ अंशु.

Friday, July 20, 2018

*उपलब्धि*

1 मेरी कहानी- प्रतिलिपी कथा स *उपलब्धि* स्‍तब्‍ध ! निःशब्‍द ! किंकर्तव्‍यविमूढ़ ! एकदम जड़ से हो गए हैं, रघुनन्‍दनजी एवं उनकी पत्‍नी। आनंदित हों या दुखित नहीं समझ पाए हैं। अभी तक अपने आपको वे लोग सर्वाधिक परोपकारी, परमार्थ में लिप्‍त आदर्श मानते रहे हैं। पर--उनकी ये प्रबल धारणा कहाँ विलुप्‍त हो गई है। पल भर में दर्पण स्‍वयं उनको अपना प्रतिबिम्‍ब दिखला गया है। आत्‍मज्ञान सच्‍चा आनन्‍द प्रदान करता है। इन क्षणों में वे दोनों अनायास इतने-अकेले दुर्बल सा अनुभव क्‍यों कर रहे हैं। मन की अन्तरचेतना झकझोर दे रही है। आध्‍यात्‍मिक विचारों की भावना प्रगट होनी चाहिए। मानव जीवन की सफलता भी इन्‍हीं पर आधारित होती है। अपने आदर्शों का पालन स्‍वतः करते आए हैं वे। पर उनके नियम धर्म पालन में कहाँ क्‍या छूट गया है। इतनी ऊंचाइयों पर पहुंचने का श्रेय रघुनन्‍दन जी एवं उनकी पत्‍नी यशोलक्ष्‍मी इन्‍हीं विचारों को दिया करते। अभी कुछ समय उपरान्‍त ही उन्‍हें प्रदेश के राज्‍यपाल के द्वारा ‘सर्वोच्‍च गौरवशाली पुरस्कार मिलना है। जीवन के समस्‍त श्रम का सुफल' जो वे दोनों अब तक निभाते आए हैं। पर.......अन्‍तर्मन की इस आवाज को वे दबा नहीं पाते हैं। क्‍या वे वास्‍तव में इस पारितोषिक के हकदार हैं। क्‍यों ? प्रश्‍न सा गूंजने लगता मन में। इसी प्रश्‍न ने सहसा यहाँ प्रगट होकर उनकी इतनी बड़ी उपलब्‍धि को क्षण भर में बौना बना दिया है। समय से जागृत कर चेतन कर दिया है। सही रूप से मार्ग निर्देशित करके। सिर झुका लिया है उन्‍होंने। उसके उच्‍च विचारों का अक्षरशः न केवल पालन करने हेतु बल्‍कि अपने कार्यों द्वारा भी स्‍वयं को बदलने का प्रण कर लिया है। और.......सपत्‍नीक रघुनन्‍दनजी आगे, नहीं ही बढ़ पाए हैं। पुनः उसे अपने साथ लेने हेतु आतुर होकर वापस लौट पड़े हैं। मन की दुविधा लुप्‍त हो चली है। बिखरती भावनाओं को एक सही दिशा मिल गई है। अपनी उस कमी को ही दूर करने की शुरूआत हो चुकी है। ‘विचार थमे नहीं हैं, सोचते हैं।' अभी तक के जीवन में किए गए सार्थक प्रयासों व सामाजिक कार्यो को एक नया आयाम, नए रूप में प्राप्‍त होने जा रहा है रघुनन्‍दन जी को। अभिनन्‍दन हेतु जा रहे हैं। प्रसन्‍नता किसे नहीं होती है। फिर इस दुर्लभ पारितोषिक की तो कब से राह देखते आ रहे हैं। अब राज्‍य सरकार का निमंत्रण पाकर अधीर ही नहीं उत्‍सुक भी हैं। शीघ्र अपना पुरस्‍कार पाने को। अपार वैभव, धन-समृद्धि, माँ लक्ष्‍मी की कृपा दृष्‍टि, सर्व सुख संपदा का साम्राज्‍य है उनके पास। जिस काम में वे हाथ डालते हैं, वह सहज प्राप्‍य होती है। पूरी निष्‍ठापूर्वक, सावित्‍क-धर्माचरण, कर्तव्‍य परायण, मर्यादित रहकर-परसेवा में पति-पत्‍नी दोनों को पूर्ण विश्‍वास है। दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती जाती है। तब भी विचारों में सदा मगन रहा करते हैं। कैसे और आगे बढ़ा जाए ?एक छोटे से व्‍यवसाय से कदम बढाकर, आज इन ऊंचाइयों पर वे किस तरह पहुंच गए हैं वो ही जानते हैं। अन्‍तस्‍थल के किसी कोने से एक निर्बल सी आवाज उनके कानों में आ टकराती है। इसके लिए भी कितने यत्‍नपूर्वक कूटनीति अपनानी पड़ी है। वरदहस्‍त से वे, दान-दक्षिणा परहित में विश्‍वास करने लगे। जिससे उन्‍हें प्रसिद्धि प्राप्‍त होने लगी। अनवरत आगे बढ़ने के लिए, उन्‍होंने यही मार्ग अपना लिया है। मन की इस उक्‍ति को वे प्रायः झटक देते। बांटेंगे तभी तो पाएंगे ‘प्रसिद्धि एवं समृद्धि।' नाम से प्रसिद्ध होंगे तभी सम्‍मानित होंगे। जीवन का लक्ष्‍य उन्‍होंने यही बना लिया है। पति-पत्‍नी दोनों ने अपनी सारी मानसिक, शारीरिक शक्‍ति भी लगा दी है। फलस्‍वरूप ‘कुबेरपति' बन गए हैं। संसार की समस्‍त खुशियाँ व अपना प्‍यारा परिवार है उनके पास। सच्‍चे अर्थो में सहभागिनी, सहधर्मिणी ईश्‍वर में सच्‍चे आस्‍था रखने वाली पत्‍नी। यशोलक्ष्‍मी यथा नाम तथा गुण। हर कदम साथ रखती हैं। नाजों से पला, पलक पांवड़ों पर बिठाला, लाड़ला बेटा ‘दिव्‍यांशु'। ‘सरस्‍वती देवी' की दया से अत्‍यन्‍त मेधावी, हर चीज में सदैव आगे अग्रणी रहने को ही उत्‍सुक रहता। यशोलक्ष्‍मी व रघुनन्‍दन जी को एक यही पीड़ा रहती। बेटे से उनके विचारों का तारतम्‍य न रहता, भावनाएं कभी नहीं मिलतीं। पति-पत्‍नी दोनों ही उसे अभी अपने अनुसार नहीं ढ़ाल पाए। पश्‍चिमी सभ्‍यता के आचार विचार, आधुनिकता में मग्‍न, सबसे विलग रहता। अपने दोस्‍तों की फौज से घिरा, गीत-संगीत में पूरा मस्‍त। अपने माता-पिता की ये मान-सम्‍मान यशोगान परोपकार की भावनाओं को नकारता, कृत्रिमता मानता। उसे सब कुछ बनावटी लगता। यहीं बाप-बेटे में दरार बढ़ती जाती। ये ही ‘जेनरेशन गेप' है। वे सोचते, उन लोगों को बड़ी मानसिक तकलीफ हुआ करती। दिल से चाहते, युवा होता बेटा उनकी सभी सभाओं, क्रियाकलापों व सामाजिक कार्यों में हिस्‍सा लेने लगे तो न केवल मान सम्‍मान बढ़ने लगेगा वरन नाम भी बढ़ेगा। इसी चाहत से दिव्‍यांशु चिढ़ा करता। कह भी देता, पापा-माँ ये सारा दिखावा क्‍यों करते हैं। आप लोग स्‍वार्थी हैं, ढकोसला है यह सब। अपने आपको प्रदर्शित करने का एक बहाना है। बेटे को वे कभी नहीं समझ पाते। समृद्धि-संपदा प्राप्‍त करने का ये भी एक शालीन रास्‍ता है। मुक्‍त हस्‍त से बांटोगे सारी नियामत पाओगे। तभी तो हम.......। बेटे को इस सबसे कोई मतलब नहीं रहता। माँ-पापा चिन्‍तित दुखित रहते उसकी बातों से। परस्‍पर वार्तालाप भी सीमित रहता। वैचारिक असामंजस्‍य भी बना रहता। उत्‍तर-दक्षिण ध्रूव की तरह। उस दिन भी बड़े मान-मनुहार के बाद वे लोग अपने बेटे दिव्‍यांशु को साथ चलने हेतु मना पाए। पुरस्‍कार सम्‍मान प्राप्‍त करने के आयोजन में माँ-पिता को बेटे की उपस्‍थिति अनिवार्य सी ही महसूस हुई। पूरी तैयारी करते देर होती जाती। समय कम बचा है। ड्राइवर से पहले ही हिदायत कर दी, रघुनन्‍दन जी ने थोड़ी तीव्रता से ही चले चलना। समारोह स्‍थल पर कुछ पहले पहुंचना ही उचित है। मंदिर में दर्शन करना है यशोलक्ष्‍मी ने कहा। पति-पत्‍नी परस्‍पर वार्तालाप में मग्‍न, प्रसन्‍नचित होते जाते। बेटा गाड़ी में ड्राइवर के साथ अगली सीट में बैठा वाक्‌मैन लगाए मस्‍त है। सब कुछ से पूर्णतः उदासीन, तटस्‍थ भाव से, अपने आप में सिमटा निर्लिप्‍त सा, विचार मग्‍न है। बचपन से इतना वैभव पूर्ण सुख, मान सम्‍मान लाड़ प्‍यार से ओत प्रोत है। अतः कुछ जिददी सा ही बन गया है। हाँ अपने व्‍यस्‍त कार्यक्रमों के कारण ही वे उसे पूरा समय नहीं दे पाए हैं। कभी ‘सामाजिक-व्‍यवसायिक' व्‍यस्‍तता बनी ही रही है। अपने ऐश्‍वर्य का यही गुरूमंत्र उसे नहीं दे पाते यहीं उनका वश नहीं चलता। अपने ड्राइवर से ‘‘थोड़ा और तेज चलो'' कहकर आराम करने हेतु तनिक पलक झपकी ही कि तेजी से बैरक लगने की आवाज आई। झटका लगने से नींद खुल गई। झांककर बाहर देखा, एक नन्‍हा सा किशोर गिरा पड़ा है। धूल धूसरित गंदा सा, फटे पुराने कपड़े पहने रूआंसा सा उठकर खड़ा हो गया। लंगड़ाकर चल रहा है रघुनन्‍दन ने कहा, देखकर चला करो, रोड पर चलने का तरीका सीखो। जाने कहाँ से चले आते हैं, हमारी ही गाड़ी से टकराने को। वैसे ही पहले से देर हो रही है।‘‘ तुरन्‍त जेब से एक सौ' का नोट निकाला, उसे देते हुए कहा ''लो इसे रख लो, दवाई करवा लेना।'' ‘‘ओफ, सुबह सबेरे ही जायका खराब कर दिया है'' यशोलक्ष्‍मी ने प्रगट किया। अपने संगीत में मगन, दिव्‍यांशु का ध्‍यान अभी तक यहाँ नहीं आ पाया था। वह अपने आप में केन्‍द्रित था। तभी उसकी दृष्‍टि बाहर पड़ी। ‘‘ड्राइवर रोको।'' अचानक जागृत होकर वह गाड़ी के बाहर लगभग कूद ही पड़ा। अपना वाक्‌मैन कानों से दूर फेंककर उसने तुरन्‍त ही उस लगभग रोते हुए बच्‍चे को, गंदे से लड़के को पूरे अपनत्‍व से एकदम अपने से लिपटा लिया। प्‍यार से थपथपाकर पूछा, ‘‘तुम्‍हारा नाम क्‍या है दोस्‍त-कहाँ जा रहे हो।'' फिर उसके पूरे बदन का निरीक्षण किया। उसे घबराया व लंगड़ा सा चलते देखकर, उसके पैर का कपड़ा उठाकर देखा। खून की एक मोटी सी धार बहती नजर आई। अपने गले का कीमती स्‍कार्फ निकालकर, लड़के के पैर में कसकर बांध दिया। उसके बछड़े को उठवाया, देख ही रहा था कि ‘‘अरे, इतने मैले-कुचैले कपड़े वाले घृणित से लड़के को जाने कितने दिन से स्‍नान तक नहीं किया है ,क्‍यों पकड़ लिया है तुमने। अछूत सा , पहले से ही रोगी लग रहा है। अभी तुम, बेटे नहा धोकर तैयार हुए हो, क्‍या जरूरत है छूने की। पैसे तो दे दिए हैं हमने, अपना इलाज करवा लगा।'' माँ ने कहा। दिव्‍यांशु ने पलटकर देखा, ‘‘अभी मंदिर भी चलना है, इन बच्‍चों को तो कुछ समझ भी नहीं है, ऐसे लोगों को तो तुरन्‍त कुछ ले देकर रफा दफा करना चाहिये चलो भी बेटे '',पुनः माँ बोली। तभी दिव्‍यांशु आगे बढ़ा, उस निर्बल से हमउम्र बच्‍चे को सहारा देकर कहा, ‘‘पापा इसे काफी चोट लगी है, इसकी मरहम पट्‌टी जरूरी है। और वो.......।'' ‘‘बेटे उसका पूरा मुआवजा हमने दे दिया है न कहीं भी अपना इलाज करवा लेगा। तुम कहते हो तो और भी कुछ देंगे ये लो।'' एक नोट और देते हुए कहा, अब चलो भी, देर हो रही है '',पापा ने कहा। ‘‘और तुम उसे छुओ नहीं। कितना गंदा है ,तुम्‍हारे हाथ ,कपड़े गंदे हो जाएंगे। अब डिटॉल , साबुन से हाथ धोना। समय की कमी है गाड़ी में बैठो, छोड़ो उसे चलो।'' माँ का स्‍वर आया। ............दिव्‍यांशु ने अब सिर उठाया, गंभीर मन्‍द स्‍वर में कहा, ‘‘पापा-माँ वो पुरस्‍कार आप लोगों को मिलना है। देर आप लोगों को हो रही है, आप निकलिये.....। मैं...मैं तो अभी नहीं चल पाऊंगा। हमारे द्वारा इसे कितनी चोट पहुंची है ,मैं इसे कुछ डाक्‍टरी सहायता देकर आता हूं। यहाँ इसे गांव से तो मीलों दूर जाना होगा, ये जा न सकेगा पैसा होगा तो भी, दवाई नहीं मिल पाएगी तब क्‍या इसका ये जख्‍म और नहीं बिगड़ जायेगा।'' ‘‘अरे चलो भी बेटे, क्‍या बेकार सिरदर्द पाल रहे हो।'' माँ के कहते ही, बेटे ने प्रत्‍युत्‍तर में कहा, ‘‘पर माँ तुम तो उस दिन मेरी उस छोटी सी चोट लगने पर ही कितनी व्‍याकुल हो उठीं थीं। पापा ने तो बिना देखे ही दो-तीन डाक्‍टर बुलवा लिये थे। खैर.....मैं तो इसे छोड़कर नहीं चल सकूंगा इसे कुछ आराम दिलवाकर आता हूं तुरन्‍त। पापा-माँ आप लोग निकलिए, ये तो हाई वे है। कोई भी गाड़ी मुझे मिल जाएगी। मेरे लेट होने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आप लोग प्‍लीज समय से पहुंचें।'' गाड़ी से उतरकर दूर हट गया वह ‘‘ड्राइवर जाओ तुम, मेरी चिन्‍ता नहीं करो।'' रघुनन्‍दन जी-यशोलक्ष्‍मी देखते रह गए अपने प्‍यारे लाड़ले बेटे का ये रूप् ‘‘अपूर्व विचार'', जो उनके लिए तो बिल्‍कुल अनजान थे, नये थे। भाव विव्‍हल हो आल्‍हादित हो उठे वे। उसका तो उनकी हर गतिविधियों समाजसेवा पार्टी डिनर आद से अत्‍यन्‍त दूर का भी कोई वास्‍ता नहीं रहा है। माँ पिता की हर बात को दिखावा मानता है। ये आज उसे क्‍या हो गया है ? उसके अन्‍दर ये कैसा मानव छिपा है। कैसे निराले विचार हैं उसके। प्रिय बेटे के उच्‍चवर्गीय अमीरजादे दोस्‍त, कान फोड़ने वाला संगीत, नित नए फैशनेबल अंदाज को वे सदैव उन सबकी उच्‍छृखंलता या आधुनिकता मानते रहे हैं। उसी की ये अनुभूति, मार्मिक-भावना, कौन से पवित्र सुसंस्‍कारों की प्रतीक है। जिसने उन दोनों को अंतर्मन तक झकझोर कर दिया है। देर होती जा रही है उन्‍हें, जाना जरूरी है। बेटा बड़ी मुश्‍किल से साथ आया है। उसकी बात न मानकर जबर्दस्‍ती नहीं की जा सकती है। उसने जो कार्य सोचा है, पूरा करके ही आएगा, जानते हैं उसकी आदत। यशोलक्ष्‍मी अवाक्‌ ! हतप्रभ ! दोनों माँ-पिता ने एक दूसरे को निहारा। कुछ भी कहने सुनने सुनने को नहीं बचा है। वे गलत हैं या बेटा सही है। क्‍या कहें, किससे कहें। हाँ धर्मसंकट आन पड़ा है समक्ष। दोनों तरफ आवश्‍यक महत्‍वपूर्ण कार्य है। बेटे ने कहा, ‘‘ड्राइवर भैया जाओ, स्‍टार्ट करो।'' असमंजस में पीछे पलटकर देखा। साहब लोग मौन हैं स्‍वीकृति है, सोचकर गाड़ी बढ़ा दी, उसने। तनिक आगे बढ़ने पर, रघुनन्‍दनजी चैतन्‍य हुए। भावों ने अंगड़ाई ली। उन लोगों को पूरे प्रदेश के सर्व अग्रणी-समाजसेवी के रूप में उनके द्वारा दिए दान, किए गए कल्‍याणार्थ कार्यो पर आधारित ये सर्वोत्‍कृष्‍ट पारितोषिक स्‍वयं प्रदेश के राज्‍यपाल देने जा रहे हैं। क्‍या वे इस योग्‍य हैं ? उनका मन डगमगा गया है। अनजानी व्‍यथा से मनभर उठा है। क्‍या वे मात्र दिखावा करते आए हैं अब तक ?अपनी छल प्रपंचमयी कूटनीति अपनाते आए हैं। क्‍या समृद्धशाली बनने का अचूक हथियार है ये। कुछ भी नहीं सोच पा रहे हैं मन खुंदक सा हो गया है। उनके अपने बेटे ने इस एक क्षणांश में ‘मानवता' का सही पाठ पढ़ा कर सद्‌मार्ग दिखला दिया है। सारी ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, छूत-अछूत, जाति-पांति के भेद को परे हटकर सत्‍यनिष्‍ठा से, निःस्‍वार्थ भाव से मानव पीड़ा बांट रहा है। नन्‍हें अनजान हम उम्र बच्‍चे को भी अपने जैसा मानकर कृत्रिमता नहीं, स्‍वांग नहीं, कर्तव्‍यपूर्ति नहीं उन्‍हें सीख दे रहा है। उन्‍हें लग रहा है आधुनिकता का आवरण तो वे ओढ़े हुए हैं। बेटे के निश्‍छल भेदभाव रहित वास्‍तविक स्‍वरूप ने उन दोनों को गहरी टीस दी है जख्‍म सा महसूस हो रहा है। उनकी अब तक की कार्यप्रणाली उनको स्‍वयं छोटा बना गई है। बेटा बड़ा बन गया है यथार्थ प्रगट हो गया है। मधुमक्‍खियां अंधेरे में रहकर कार्य करतीं हैं। विचार मौन में कार्य करते हैं। ‘नेक कार्य' भी गुप्‍त रहकर कारगर होते हैं । यही ज्ञान का सच्‍चा स्‍वरूप है। तभी मधु प्राप्‍त होता है। और.......वे लौट पड़े हैं। उस नन्‍हें किशोर का पूरा स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण कराकर ही आगे जाएंगे सोचकर। पुरस्‍कृत तो होना है। विलंब से सही। पर वास्‍तविक पुरस्‍कार तो उन्‍हें प्राप्‍त हो गया है। अपने सपूत की पवित्र भावना जानकर। कितनी बड़ी उपलब्‍धि प्राप्‍त हो गई है आज, मन की आँखें भी खुल गई हैं। कल्‍याणकारी कार्यो की पूर्ण सफलता तभी पूर्ण होती है, जब उनको अपने जीवन में भी अमल किया जाए। किसी भी दिखावे को नहीं। तभी उनका गहरा जख्‍म भरेगा। समझ गए हैं। सूर्य जब गहरे बादलों से घिर जाता है, तो उसके प्रकाश का महत्‍व कम नहीं हो जाता। पवन उन्‍हें उड़ाकर शीतल जल रूप में बरसा देती है। इन्‍हीं स्‍वार्थ रूपी मेघों ने अन्‍तर्स्‍थल पर सुसंस्‍कृत भावनाओं की बौछार कर दी है तन-मन के स्‍नेह को फैलाकर। अब अनेक उज्‍जवल रश्‍मियां पूर्ण गरिमा के साथ ‘‘नव आलोक'' को पूर्ण गगन में विस्‍तारित करके सुनहरा प्रकाश फैलाकर उल्‍लासित हो उठीं हैं। ------------------------------------------------------- लेखिका- श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल मेरी प्रस्तुत कहानी प्र स हेतु.

*माटी की खूशबू*

लेखिका - अलका मधुसूदन पटेल 2 मेरी कहानी- प्रतिलिपी में क स हेतु **माटी की खूशबू** सदाशयता या भावनाओं के प्रवाह में बहकर नही वरन नितांत गंभीरता से ही डिप्‍टी कलेक्‍टर प्रशांत ने अपना निर्णय जानना चाहा।‘‘ मैं जानता हूं भानू सब समझता हूं। तुम्‍हारा जो भी फैसला होगा, मुझे मंजूर होगा। तुम्‍हारी इच्‍छा का सम्‍मान करूंगा। हां पर सोचो जीवन के किसी मोड़ पर तो एक साथी की जरूरत पड़ेगी ही न। जो बिल्‍कुल तुम्‍हारा अपना होगा, तुम्‍हारे सारे सुख दुख समेटेगा। अच्‍छाइयों बुराइयों के साथ अपनाकर तुम्‍हारे कदम पर कदम चल सकेगा। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा। आशा है परिणाम मेरे पक्ष में होगा।''........ ‘‘इंतजार करूंगा मैं तुम्‍हारा।'' बार बार उसके स्‍मृति पटल पर प्रशांत के वे ही शब्‍द मिटते उभरते। ‘भावना' अपनी अव्‍यक्‍त घनी उदासी में डूबी रहकर यही सोचती रही हैं उसके अकेलेपन व सूने जीवन के साथी तो प्रशांत से अधिक कोई नहीं हो सकता हैं। वे ही तो हैं जो उसके रूप ही नहीं गुणों की भी कद्र सदैव करते आए हैं। कितनी धीरता से उसका मनोविश्‍लेषण करते रहे हैं वे। पिछले कुछ दिनों से उसके परिस्थितियों के मूक साथी भी तो हैं। अपने छोटे से जीवन में कितने उतार चढ़ाव देखती रही है। भीषण झंझावातों से झुकी नहीं हैं। अनेक ही कठिनाइयां आती रहीं हैं। पग पग पर डगमगाई तो है पर सँभलती रहीं। बाहृय आडंबरों के कितने घने जालों में फंसकर निकल चुकी है। बिखर नहीं पाई है, प्रबल आंधियों से टक्‍कर ली है भागी नहीं ही है। पर........अब जिन्‍दगी के इन भीगे क्‍लांत क्षणों में अनायास उसके मन किसी के कंधे पर सिर रखकर शीतलता पाने का हो रहा है। जीवनपथ पर जबसे प्रशांत आ मिले हैं सबकुछ छोड़कर उम्र जाति धर्म उलझनों से बहर निकलकर केवल उनका ही साथ चाहती है भावना। कितने असमंजस संघर्षात्‍मक स्‍थिति में है वह, प्रदर्शित नहीं कर पाती है वैसे भी कुछ समय से उसने सबसे अलग सा कर लिया है अपने आपको। घर में भी तो कितनी सीमित रह गई है। प्रशांत ने आज मिलने बुलाया है। वह अपना निर्णय प्रकट कर ही देगी। अब नहीं भटकेगी उलझेगी। कब तक वह स्‍वयं को ही प्रज्वलित करती रहेगी सबके लिये। उसकी संवेदनाएं और जागृत हों, इसके पूर्व ही वह निकल पड़ेगी। अनगिनत विचारों की मानसिक उथल पुथल में उसने फैसला ले लिया हैं। पूर्ण चैतन्‍य होकर आगे बढ़ने को उद्यत हो उठी है भावना। स्‍वनिर्णय से पूर्ण संतुष्‍ट निर्भय। भावना को आज कहीं नही जाना है। रोज ही अपनी नौकरी व ट्‌यूशनों में उलझनों में उलझी रहती है। आज विद्यालय की छुट्टी है। घर में किसी काम में मन नहीं लग रहा है। यहां का सब कुछ उसे आडम्‍बर पूर्ण लगने लगा है। संवादहीन सी स्‍थिति बनी रहती है। वैसे भी प्रतिदिन व्‍यस्‍तता में बाहर रहने के बाद यहां की निरर्थक उदासी की बोझिलता से दूर ही रहना चाहती है। जाने क्‍यों उसे लगने लगा है, उसकी अब किसी को कोई जरूरत नही है या समय से उसका विवाह न कर पाने का दुःख उसके परिजनों काट रहा है। वह भी सबसे कटकर एकदम निर्लिप्‍त तटस्‍थ हो उठी है। तैयार होकर निकलने के पूर्व, दर्पण में अपना अपना अश्‍क देखा। उम्र के इस मोड़ पर भी कितनी आकर्षक व दीप्‍तिपूर्ण चेहरा लग रहा है। साथ ही उसकी योग्‍यता से तो उसको मिलने वालों में प्रशंसा और मिलने की उत्‍सुकता उत्‍फुल्‍लता है। बाहर निकली, देखा....पापा सामने खड़े हैं। ध्‍यान से देखती है कितने कमजोर, अशक्‍त लग रहे है। इतने दुबले हो गए हैं क्‍यों ? कितने दिनों बाद उनको देखने का मौका मिला उसे? व्‍यस्‍तता रही या कोई बहाना। अपने आपसे पूछती है। वे भी कहीं जाने को तैयार हैं, हाथ में लाठी का सहारा लिये खड़े हैं। अचानक उसके मन में उसके वे बलिष्‍ठ पिता झांक जाते है, जिनके आगे पीछे वह डोलती फिरती थी। अपने प्रश्‍नों उत्‍तर के चंगुल से उन्‍हे सांस तक लेने का अवसर नही देती। उसके सारे संकटों व्यवधानों का पल में निर्णय कर सदैव उसे चिंतामुक्‍त रखा करते। उसके दृढ़संबल, प्रेरणास्‍त्रोत प्रबल पक्षधर उन्‍हीं के सहारे शायद वह इतने आगे बढ़ सकी है। क्‍या हो गया है उसे , पापा की लाड़ली वह तो बेटी नही बेटा बनकर ही रही है। क्‍यों लगा है उसे......इतने दिनों बाद ?‘‘कहीं जा रहे हैं आप ?'' पूछती है वों। ‘‘हां बेटी'......आज वो लायंस वालों ने ‘‘आई कैम्‍प'' लगाया है। सोचता हूं वहीं अपनी दूसरी आंख का ‘मोतियाबिन्‍द' भी बनता लूं। कुछ बचत भी हो जाएगी, पहली आंख की दवा भी हो जाएगी। देख ! कितना पानी बहता रहता है, पोंछते हुए कहता हैं। डाक्‍टर्स व क्‍लब वालों ने आश्वासन दे दिया है वहां के लोग बडे अच्‍छे हैं।'' ‘‘पर पापा पिछली बार इसी तरह के किसी कैम्‍प में ही तो आपकी आंख का ये पानी......।'' कहते रूक जाती है। शब्‍द कहीं खो से गए हैं। निःशब्‍द ! रहकर मन कैसा तो हो जाता है। ‘‘ओह पैदल जा रहे है। क्‍या !''जानती है वो इधर आजकल वे पैदल ही जाते हैं। वे कुछ भी नहीं कहते, बस उसे देखते ही रहते हैं। उससे देखा नहीं जाता। उनकी वह दृष्‍टि झेल नहीं पाती। ‘कैटेरेक्‍ट' की पीड़ित आंख से लगातार बहते पानी को देखकर वह अंदर तक हिल जाती है। पर्स से कुछ नोट निकालकर पापा की ओर बढ़ती है। पिताजी लेते नहीं है। ‘‘रहने दो बेटा, दूर ही कितना है चला जाउंगा धीरे धीरे।'' पर भावना सामने से ‘‘आटो'' बुलवा देती है। उसे ‘‘नोट'' देकर कहती है। ‘‘लो भाई काटकर बाबूजी को दे देना।'' उन्‍हे जाते दूर तक देखती रहती है। जानती है उतने रूपये वे हफ्‍ते भर तक चला लेंगे। पापा कितने खुश रहा करते थे। अब तो उनके मुंह पर हंसी आती ही नहीं है मानो। जब से रिटायर हुए हैं, कैसी बेबसी झाँकती है, आँखें ही पिघल रही हों जैसे। कितनी तेजी से वृद्ध होते आ रहे हैं। उससे कुछ भी लेने में क्‍यूं हाथ कांप जाते हैं। हर महीने पेंशन के रूपये मां के हाथ में देकर कहते हैं, ‘‘लो सम्‍हालकर खर्च करना ‘‘रिटायर्ड आफिसर'' को कितने रूपये मिलेंगे।'' कितनी शान से....... गर्वीली जिंदगी बिताई है पापा जी ने। ‘‘ईमानदारी के सर्वोत्कृष्ट स्‍वरूप।'' पर भावना को लगता है, कुछ भी तो नहीं हैं पापा के पास। क्‍या आदर्शों को कोई मान नहीं है। कभी सोचती है यदि अन्‍य तरीकों से इधर उधर के कार्य किए होते, तो क्‍या वे सब यों भटकते। उनका बड़ा बेटा कहीं बड़ी नौकरी में होता। उनकी बेटी इस एकमात्र पुत्री की बड़े ही धूमधाम से अच्‍छी जगह शादी हो चुकी होती। उसका छोटा भाई डाक्‍टरी इंजीनियरिंग में आसानी से प्रवेश पा लेता। उनका कहीं बड़ा सा बंगला होता। बैंक बैलेंस होता। ‘‘दुहिता'' से अपने ‘‘प्‍यारे पिता'' की वेदना नहीं झेली जाती। पर क्‍या ? सिर्फ अपनी नजर बचाने से इन समस्‍याओं का समाधान हो सकता है। ‘‘वो क्‍या करे, न करे, अपनी उलझनें यहां किसी से नही बांट सकती।'' तीव्रता से भावना बाहर जाने को चल पड़ी। लगा कमरे से कोई आवाज आई है, झाँककर कमरे में देखा। ये....क्‍या ? अम्‍मा बिस्‍तर पर क्‍यों लेटी हैं। वे तो सदैव चुस्‍त दुरुस्त बनी रहती हैं। उसे तो याद नहीं कि वे बिना मतलब कभी लेटी भी हो। वह मां के पास आकर बैठ जाती है। ‘‘अरे मां तुम्‍हें तो बुखार है इतना ज्‍यादा।'' छोटा शानू कहता है, ‘‘दीदी मां को पिछले एक हफ्‍ते से बुखार आ रहा है, पर वो अस्‍पताल नहीं चलतीं, मैं ही दवा ले आता हूं।'' ‘‘अब दवाओं से कुछ नहीं होना बेटा, अब तो ऊपर जाकर ही ठीक होऊंगी।'' मां के कहते ही उसका दिल धड़क जाता है। मां को तो कम निराश देखा है। सारे घर का मजबूत आधार वे ही रही हैं। दवाओं के व्‍यर्थ ख़र्चे से बचना चाहती हैं, मन खट्‌टा हो गया है। मां की दृष्‍टि में उन सबके लिए कितना प्‍यार, चिन्‍ता झलकी पड़ रही है। देखा कितना सट पर बैठा हुआ है छोटा मां से। रूआँसा हो उठा है। छोटे के लिए कितना तो लाड़ उमड़ आया भावना के मन में। ‘‘दीदी मेरी दसवीं कक्षा के फार्म्स आ गए है।'' ‘‘तो रोनी सूरत क्‍यों बना रखी है, चलो हम फीस दे देंगे।'' ‘‘फीस तो भर दी है।'' छोटे ने कहा। ‘‘तब क्‍या प्राब्‍लम है।''-- ‘‘वो मुझे मैथ्‍स की ट्‌यूशन लेनी है।'' ‘‘अरे इतनी सी बात है कितने रूपये देने हैं लो रखो, दे आना, तुमने क्‍यों नहीं बताया अभी तक।'' जानती हैं कितने दिनों से तो भाई से बात तक करने की फुर्सत नहीं मिल पाई है। वह किससे कहता, कब कहता, क्‍या कहता। मां भी क्‍या करतीं, वैसे ही चिंतित हैं। आंगन से चौके में ही उसे भाभी दिख जाती हैं। वे चाहकर भी बाहर कहां निकल पाती हैं। उसे देख कर कहती हैं, ‘‘बिब्‍बो'' कहीं जा रहीं हैं, आज तो आपके पसंद का खाना बना है। गर्म खाकर ही जाइये।'' वह पलट पड़ती है, मन अशांत है। भूख न होने पर भी भाभी का मान रखने के लिए अंदर आकर बैठ जाती हैं। गोरी चिट्‌टी, सुन्‍दर, सुघड़ सी भाभी के इन्‍हीं गुणों पर रीझकर पसंद किया था उन लोगों ने। कितना गर्व हुआ करता। बड़ी उमंगों से बड़े भैया ने भी स्‍वागत किया था इनका। कितनी शिथिल लग रही हैं। इतनी कम उम्र में भी कितनी निराश है। वह अब किसे दोष दे, इतना अच्‍छा भोजन भी बेस्‍वाद लग रहा है। अपनी स्‍नेही भाभी की वीरान आंखे ही मानो उनकी मुसीबतों व परेशानियों का दर्पण बन उठीं है। दिन भर सबके लिए खटती रहकर भी, सब कुछ पूरा करके, सामंजस्‍य बैठाना ही उनका काम है। कितना कष्‍टप्रद होता होगा, उनके लिए सब कुछ ! पर उफ ! तक नहीं करतीं। सबसे बचने के लिए ‘‘वो'' भी बाहर रहना चाहती है। उसके उठने के पहले ही भाभी उसके कान में धीमे से कहती हैं।'' ‘‘बिब्‍बो, इस बार तो तुम्‍हारे भैया ने पूरी तनख्‍वाह के रूपये लाटरी में लगा दिए हैं। कुछ भी कहो, तो खाना ही छोड़ देते हैं।'' आकुल भाभी की व्‍याकुलता देखकर उसकी अन्‍तर्चेतना ही मानो बिखरती प्रतीत होती हैं। अपने से 8-10 साल बड़े भाई को वह किस तरह समझाए। बतातीं हैं वे, ‘‘उनके असहज रूखे व्‍यवहार से खिन्‍न होकर मां पिताजी ने भी कुछ कहना सुनना छोड़ दिया है।'' कुछ कहती भावना, तभी भाभी ने कहा, ‘‘कहीं से नींद की गोलियों ही ला दो बिब्‍बो। खाकर सो रहूंगी, अब तो रहा नहीं जाता।'' अश्रु बहते जाते हैं। तभी धीमे से भैया आकर बाजू में बैठ जाते हैं। शायद अभी उन्‍हें यही निदान समझ में आया है। और तो कोई बुरी लत रही ही नहीं कभी। तब ये क्‍या हो गया उन्‍हें। क्‍या ? कोई ‘‘लालसा.....धुन'' ही एकदम पैसा कमाने की बढ़ गई है। स्‍वयं ही प्रताड़ित होते हैं। उनसे कुछ नहीं कह सकती कोई अन्‍य उपाय ही सोचना बेहतर होगा। पुनः भावना चलने को तत्‍पर होती है। तभी मां के कमरे से जोर के कराहने की आवाज जाती है। भैया दौड़कर वहां पहुंच गए हैं। उनके पैताने पर बैठते ही मां कहती हैं। ‘‘मेरी बिब्‍बो भावना बेटी' का ध्‍यान रखना। जो हम न कर सके, तुम कर देना बेटा। हमारा तो कोई भरोसा नहीं है अब।'' कहकर बेटे को एकटक देखने लगती हैं। भैया का मुंह छोटा सा हो जाता है। कितनी करूणा हो आई है उसे भैया पर। वो कितने दयार्द्र से लग रहे हैं। पर उसे जाना हैं। प्रशांत को अपना निर्णय सुनाना है। रास्‍ता देख रहे होंगे वे। यदि यहां वो और रही तो कहीं अपना फैसला न बदलना पड़े उसे, पक्‍का मन बना चुकी है। निकलना ही होगा उसे यहां से ।'' उसकी भी अपनी जिंदगी है, भावनाएं हैं। क्‍या उसका भविष्‍य यों खो जाएगा। वो अपने पर्स के रूपये गिनती जाती है। मन में कौंधता है तभी। पिताजी का आपरेशन कराना है। मां की दवाइयाँ लानी है। छोटे शानू की पढ़ाई के खर्च सामने हैं और भाभी की वो अन्‍तरिम इच्‍छा। ओह ! ‘खतरनाक गोलियां।'' भैया अकेले...... क्‍या सम्‍हाल पाएंगे ये सब। कुछ समझ नहीं पा रहीं है। केवल एक मात्र उपाय है व्‍यर्थ की चिन्‍ताओं को छोड़कर प्रशांत से ‘‘विवाह'' करके सुख से रहे। तभी उसके सुकून मिल सकेगा। वरन्‌ ये उलझनें, ये संकटों का मकड़जाल तो उसे उठने ही नहीं देगा। उसे हमेशा जकड़ते ही रहेगा। वह बिंधती चली जाएगी, घुटकर ही रह जाएगी उसकी जिंदगी। उसे अब देर नहीं करना है, किसी भुलावे में नहीं रहना है। लगता है घर भर की अशांति की जिम्‍मेदार वही बन गई शायद। कब तक यूं परेशानियों व मुसीबतों में पड़ी रहे वो। उसका मार्ग खुल गया है। नया जीवन सामने है सुनहरा भविष्‍य आमंत्रण दे रहा है। नयी नयी परिकल्‍पनाएं, नवीन सुख और उसके इंद्रधनुषीय रंग सामने हैं। हां इधर वही घुटन अंधेरे हैं। कदम उसके बढ़ते हैं.......रुकते हैं। छोटे भाई का स्‍नेह लिप्‍त चेहरा, भाभी को उसका मौन आश्‍वासन, पिता का उससे रूपये न लेना, मां द्वारा बिब्‍बो की जिम्‍मेदारी भैया को सौंपना, भाई का चुपचाप खाना खाना। माना मस्‍तिष्‍क को झकझोरते रहता है। ‘एक ओर अपूर्व सुख है, दूसरी ओर गहन दुःख है।'' घर से बाहर आकर बैठ जाती है भावना। क्‍या पलायन कर रही है वह। अपनी जिम्‍मेदारियाँ छोड़ना चाहती है या ओढ़ना चाहती है सब गड्‌मड्‌ होने लगा है। निराशा के बादल छाने लगते है। रोशनी की एक भी किरण नहीं दिखती। अंधेरे की परतों में दबी नहीं रहना चाहती। अपने दुःखों से उबरने कातर प्रयत्‍न करती है, उसके आंसू झिलझिलाने को होते हैं। अब प्रशांत को क्‍या कहेगी, उचित अनुचित की कौन सी परिभाषा कहेगी। ये सब झेल पाएंगे क्‍या वे ? उसके कष्‍टों को समझ पाएंगे कभी। भावना और खोती डूबती बिखरती कि अंदर से नन्‍हीं आशु ‘‘संपूर्ण आशा'' बनकर गोद में चढ़कर बैठ जाती है। ‘‘बुआ आप यहां क्‍यों बैठी है ? चलो हम खेलेंगे। देखो हमारी ‘गुड्‌डी' की शादी करनी है। इसने अपना ‘गुड्‌डा' भी खोज निकालना है उसी की तैयारी करनी है।'' ‘‘पर जानती हैं आप ! ये गुड्‌डा हमने नहीं हमारी गुडियारानी ने ही पसंद किया है। उसी से हम इसका ब्‍याह करेंगे। समझीं'', साथ देंगी न हमारा। सभी लोग तैयार हैं, आप हां बोलो न।'' अपनी नन्‍हीं की इन प्‍यारी बातों से वह हंस पड़ती है। भीगा मन होते हुए भी एकदम खिल सा जाता है। गुड़िया सी ही उसकी ‘आशु' अपनी नन्‍हीं बांहों में जकड़ लेती है अपनी बुआ को। इन ‘नन्‍हें सुख के क्षणों' को छोड़कर वह नहीं जाएगी कहीं। नहीं जा सकेगी। जो होना होगा, जैसे होगा, जब भी होगा। तभी बारिश की कुछ बूंदें गिरती हैं। जो उसके तप्‍त मन को ही नहीं, धरती की सूखी माटी को भी शीतल कर देती हैं। भीगी मृतिका की वह ‘‘सौंधी महक'' उसे अन्‍तर्तम तक सराबोर कर झकझोर देती हैं जो श्‍ौशवावस्‍था से ही उसे सर्वप्रिय रही है। ‘‘अपनी भीगी माटी की सुगन्‍ध। उस भीनी खुशबू में वह ये सब विस्‍मृत करके ‘‘अपना सब कुछ'' आने वाले समय पर छोड़ देती है। जानती है अंधकार को चीरकर प्रकाश की किरणें आती ही हैं कभी न कभी। ‘‘रात्रि के उपंरात सबेरा तो होता ही है।'' ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- *श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल* *स्वतंत्र लेखिका – साहित्यकार* सारांश---- साहित्यिक जीवन परिचय स्वतंत्र लेखन - सामाजिक सेवा - अध्यापन ,पूर्व शिक्षिका - कोचिंग इंस्टिट्यूट . जन्म स्थान-सागर , वर्तमान जबलपुर म प्र , पति डॉ.एम.एस.पटेल , रिटायर्ड राजकीय स्वास्थ्य सेवा उ.प्र. शिक्षा-स्कूलिंग- नेपानगर , स्नातकोत्तर "एम.एस सी. जीव शास्त्र" जबलपुर लेखकीय परिचय-1संपादन मासिक पत्रिका*पारमिता*-*2आर्टक्लब* संस्थापिका,साहित्य व विशेष विधा, झाँसी. नियमित लेखन - हिंदी व अंग्रेजी में . प्रकाशन प्रादेशिक, राष्ट्रीय स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं व अंतर्जाल पत्रिकाओं में.. लगभग १५० कहानी ,लेख ,गीत ,परिचर्चा प्रकाशित- प्रकाशनाधीन. नियमित आकाशवाणी प्रसारण २५-३० झाँसी, छतरपुर - सी केबल टी. वी. ९-१०आगरा. MEMBER OF INDIAN WRITERS CLUB INDIA INTER CONTINENTAL CULTURAL ASSOCIATION प्रकाशित पुस्तकें - कहानी संग्रहों की. १.*लौट आओ तुम*-------२१ कथा संग्रह १९९८ २. *मंजिलें अभी और हैं* - १८ कथा संग्रह २००३ ३. प्रकाशनाधीन-१. ईश्वर का तो वरदान है बेटी २. १००१ हस्त शिल्प कला पुरस्कार --------लेखन - सामाजिक कार्यों अखिल भारतीय लेखन - *कहानी प्रतियोगिता* दिल्ली प्रेस पत्रिका . १.कहानी *बंद लिफ़ाफ़ों का रहस्य* पुरस्कृत २००१ में .प्रकाशन "गृह शोभा" २००२ . २.कहानी *दूध के दांत* पुरस्कृत २००३ में .प्रकाशन “सरिता” २००४ . पुरस्कृत - तत्कालीन राज्यपाल उ.प्र. महामहिम स्व. विष्णुकान्तजी शास्त्री द्वारा. ३. सरदार पटेल महिला कल्याण समिति -सामाजिक कार्यों , नामांकन रोटरी क्लब द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर.. ४. अन्य अनेकों संस्थाओं व स्थानीय प्रशासन-लेखन निबंध सामाजिक व लायंस क्लब्स पुरस्कार. ५.Police Services are Challenge for Public Expectations- awarded essay by S.S.P.Office Jhansi blog *gyaana* ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- 3 कहानी ---**प्रतिलिपी क स हेतु प्रेषित।** कहानी लेखिका - **श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल** 4723//66 पी , विजय चौक , अधारताल ,जबलपुर ,म प्र। विशेष ---मेरी ये कहानी सादर समर्पित है मात्र 23 साल के उस दीपक साहू को जिसने 11जुलाई 2016 की रात को भोपाल की न केवल उस बस्ती बल्कि वहां रहने वाले अनेक लोगों की असमय आई प्राकृतिक विपदा (भीषण वर्षा) के प्रकोप में अपनी जान देकर उनकी रक्षा की। कहानी---- **वो उजाला “ दीपक का या किसी देवदूत ” का**। हमारे जीवन से हमें बहुत प्यार होता है। इस संसार मे आते ही हमें अपने चारों ओर सुखद वातावरण मिलता है ,बचपन में तो हर चीज हमको बहुत अच्छी लगती है। बहुधा हम अपने आसपास सदैव सुविधाएं ,सहयोग व पसंद की वस्तु पाते हैं। कोई भी परेशानी हों या कठिनाइयां ,उसका भी सीधे सामना नहीं करते। अक्सर हमारे सहयोग हेतु कोई न कोई रहता है। यही होता है परिवार ,कितना प्यारा खूबसूरत सा होता है परिवार ,हमारा समाज । पर----हाँ ,जिंदगी एक सीधी आरामदायक सपाट सड़क नही होती ,कहीं ऊंची ,कहीं नीची ,कहीं गड्ढे ,खतरनाक मोड़, संकट ग्रस्त पुलिया। कभी गहरा अंधेरा तो तीखी रोशनी। कई बार गिरना ,उठना ,संभलना। कभी सामने ऐसा चौराहा कि अचानक दिशाहीन होकर घबराना ,भटकना, असंभावित डर सामने बना रहता है। पर----हिम्मत रखकर ,साहस से ,सोच समझकर, सजगता से कदम बढ़ाते जाएं तो किसी प्रकार के भी अंधकार को दूर करके नई सुबह की खिलखिलाती रोशनी सामने प्रगट होती है। जो हमारे सुख-दुःख ,सम-विषम ,संघर्ष-उत्कर्ष से उबरकर जीवन की असली परीक्षा बनती है। इतनी सूंदर ,प्यारी व मुश्किल से प्राप्त जिंदगी में भी हमें अक्सर झटका देकर गिराने वाले मिलते रहते हैं हम जानकर ,चाहकर भी उनका कुछ नही बिगाड़ सकते। हाँ कहीं कभी अनायास सामने कुछ *व्यक्तित्व* फ़रिश्ते* बन यूं भी मिल ही जाते हैं कि हमारा टूटता विश्वास असीम आस्था में बदल जाता है। वे हाथों से छूट भी जाते हैं और हम जीवनपर्यंत उन्हें स्मरण के सिवा कुछ नही कर पाते। स्मरण हो आता है ,बच्चों के स्कूल्स अभी खुले ही हैं ,उनकी नई किताबों ,कॉपियों पर कवर चढ़ाते ,बॉक्स ,बैग्स जमाकर रखने में सहयोग करते नियमित कार्यों में देरी होती गई व चिंतातुर होकर नींद भी देर से लगी। वैसे भी नई जगह व बच्चों के पापा के बाहर रहने से मेरी जिम्मेदारी बढ़ जाती है व खटक सी भी बनी रहती। अभी हम गहरी नींद में ही थे कि लगा उस नीरव अंधेरी रात में बाहर कुछ अजीब सा शोर व गर्जन तर्जन सा हो रहा है। चुपचाप बिस्तर पर लेटकर ही सुनने की कोशिश की। धीरे धीरे समझ आया कि वास्तव में बाहर हलचल हो रही है ,सोचकर देखा सब तरफ के दरवाजे अच्छी तरह से बंद हैं ,कोई खतरा नही ,हम अपने घरौंदे में पूर्णतः सकुशल ,सुरक्षित। आने दो आवाजें ,वैसे भी घर के बाहर निकलना तो दूर ,झांकने का भी सवाल नहीं , न मध्य रात्रि में घर खोलने का प्रश्न। अभी दो मिनिट भी नही बीते कि हमारे घर के मुख्य दरवाजे पर जोर जोर से थाप की आवाजों की अनोखी गूंज मन को दिग्भ्रमित करने लगी। यही नही बाहर भी बहुत अजीब सा शोर ,पहले लगा कहीं भूकंप तो नही पर कुछ हिल तो नही रहा , तभी जोर से बिजली चमकने के बाद भयंकर गड़गड़ाहट के साथ बादल गरजे। इतने शोर में बच्चे भी कुनमुनाकर जाग गए। “क्या हुआ माँ ? कैसा शोर है ? कुछ हो गया है क्या ?” लाइट जलाने की कोशिश की तो समझ आया कि बिजली नही है। अब कुछ भय सा लगा ,फिर बाहर से आवाजें , कुछ निर्णय लेने के पहले खिड़की से झांककर टोर्च से देखना चाहा। ओह ! यह क्या ? पूरी तीव्रता से बारिश हो रही थी ,उसी की सघन कर्कश आवाजें व बढ़ता कोलाहल। पुनः सामने के ही नही पीछे के दरवाजे पर भी भड़ाभड़ ,गेट पर ताला है तब भी लगातार कौन खटखटा रहा है ? “ऑन्टी दरवाजा खोलिए जल्दी ,बाहर निकलिये ,तुरंत समय नही है। फ़ास्ट-----” मेरे कुछ सोचने , कहने ,करने के पहिले बेटे ने दरवाजे खोल दिये । अरे ये क्या ? मूसलाधार बारिश का रौद्र रूप चमकती बिजली के साथ आसमान में ही नही नीचे भी चारों ओर पानी की हिलोरों का सा समुद्र दिखा। गहरी नींद से उठकर सामने ये नजारा ,हम अकबका गए। अजब सी घबराहट में नही समझ सके क्या करें ,क्या नही क्योंकि पानी तो वरांडे के अंदर समा चुका था। तभी उसी अपरिचित बच्चे की परिचित आवाज आयी। “ऑन्टी बाहर निकलो ,यहां खतरा है। पानी बहुत जोरों से गिर रहा है व अपने मुहल्ले में तेजी से बढ़ रहा है। भयंकर जलप्लावन की स्थिति है।” मुझे कुछ समझ नही आया ,बोली ,”तो क्या करेंगे ,कहाँ व कैसे जाएंगे।” “आंटीजी अभी तो कुछ न करें ,बस बाहर चलें ,यहां रहना सुरक्षित नही है ।” मैने कहना चाहा ,”मेरा घर तो ऊंचाई पर है व घर मे कोई नही ,बंद करके कहाँ जाएं।” ओह! पर ऊपर से घनघोर बारिश ,नीचे बाढ़। “ घबराइए नही आंटीजी मेरे पिताजी बाहर हैं ,वे अपने ऑटो से सबको बाहर निकाल रहे हैं ,आप बस मेरे साथ आओ।” मैं बड़ी असमंजस में--- आधी रात को गहरी नींद से जगाकर कोइ कहे ,सब छोड़कर भागो यहां से तो कितना कठिन होगा ,ये सोचना भी। पर यही अविश्वसनीय वास्तविकता थी। हम सोते रहते या दरवाजे न खोलते ,तब क्या होता , पता नहीं ,पर अभी आसन्न बड़ा खतरा है। बाहर ये अनजान ,अपनी जान की परवाह नही करते हुए देवदूत बने बच्चे ,पूरे मोहल्ले ,बस्ती के बच्चों-बड़ों की सुरक्षा को मुस्तैद। दौड़ दौड़कर शोर मचाकर जगा रहे ,सम्हाल कर बाहर निकाल रहे ।पर अभी भी----- घर छोड़कर ,बाहर जाने का निर्णय नही ले पा रही थी ,उस संकट में धीरे से कहा ,”अरे नही बेटे ! कुछ नही होगा हमें ,व ऊपर आउट हाउस में चले जायेंगे ,सेफ रहेगा ,कुछ समय की बात है ,पानी रुकने पर सब ठीक हो जाएगा।” पर वो अड़ सा गया ,”नही कोई भरोसा नही आपको तो बाहर चलना ही होगा।अभी तो आप सब बस मेरे साथ चलो , फिर मेरी जिम्मेदारी है न वापस लाने की।” उसकी आत्मीयता व स्नेहिल विश्वास ने मानो मुझे अंदर तक हिला दिया था। न मैं उसको जानती थी न वो मुझे ,बस शायद कभी आते जाते देखा हो। तभी मेरा व मेरे बच्चों के हाथ पकड़कर वो हमें हमारे घर के बाहर लाकर खुद ही दरवाजे बंदकर ,चिंतातुर ,ले चला हमें। बदहवास से हम मानो अपने सोचने समझने की शक्ति खो बैठे, तभी अलमारी ऊपर बॉक्स में रखी मेरी महत्वपूर्ण फ़ाइल का स्मरण होते ही मैंने हाथ छुड़ाकर लेने जाना चाहा पर उसने नही छोड़ा। घर के ही किसी बड़े सदस्य की तरह अधिकारस्वरूप अनुमति नही दी मानो। लगातार जल प्रवाह बढ़ता जाता ,पहले घुटने फिर ऊपर कमर तक पानी सर्वत्र । हम घनघोर संकट में आ गए हैं कोई प्रमाण की आवश्यकता नही ,शायद आसपास के नाले उफान पर आ गए हों। ओफ़ ! परेशान ,मजबूर हम उसके साथ घिसटते से चल पड़े, उसने हमें तब तक हमें नही छोड़ा जब तक ले जाकर अपने पिता के ऑटो में बिठालकर सुरक्षित नही भेज दिया। बस इस आने जाने के उपक्रम में ही आसमान से चमकती बिजली की रोशनी में हमने उसको व उसने हमें देखा। इसी वक्त ध्यान से उस कम उजाले में मैंने उसे पूरी तरह से देखा “अठारह बीस साल का लगता बिल्कुल बालसुलभ भोले से सूंदर से चेहरे वाला *दीपक* यही नाम है उसका ,साथ में उसी के जैसे और कई सहयोगी लड़कों का ग्रुप ,जो कितने महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए थे ,अभी समझ आ रहा है। ओह ! क्या ये हमारी वही युवा पीढी है जिनको बहुधा हम लापरवाह या गैर जिम्मेदार समझते हैं। न अपनी चिंता ,न कोई सुरक्षा ,बस तत्पर रहे दूसरों के लिए ,यूं लगा मानो उन्होंने इन विलक्षण पलों में ठान लिया है पूरे मोहल्ले को बचाना। सामने के हर व्यक्ति का कैसा अपूर्व जिम्मा लेकर , शायद यही उनकी उम्र के निडरता या साहसी बनने का तकाजा। केवल वही नहीं उस बच्चे का पूरा परिवार कैसे व किन संस्कारों के कारण सारे लोगों को बचाने को एकजूट हो गए । न कोई रिश्ता ,न पहचान ,पर इतनी फिकर या रिस्क तो शायद किसी के घरवाले भी ऐसी परिस्थिति में नही कर पाते। ओह ! सच ,धन्य हैं ये सब व उनके सान्निध्य में धन्यभाग हम *क्या हमारे फरिश्तों या देवदूतों का यही सूंदर रूप होता है ?* हमें सकुशल भेजकर ,सुरक्षित सही जगह पहुंचाने का जिम्मा अपने पिता को देकर वो अपने साथियों के साथ वापस दौड़ गया। ये तो बहुत बाद में समझ आ सका कि उस अनजाने प्राकृतिक प्रकोप से आधी रात को जब वह साधारण सी बस्ती अनायास यूं पानी मे डूबने लगी तो कोई अंदाज तक नही लगा सका था कि जाने अनजाने ऐसे प्यारे बच्चे फ़रिश्ते बनकर सबको पार लगाने आ जाएंगे। सारी रात वे अपने भरसक प्रयासों से अपने सेवा कार्यों में लगे रहे। उन पलों ने हम सब मोहल्ले वालों को एक कर दिया ,कहीं कोई छोटे बड़े-अमीर गरीब-जाति पांति का भेद नही रहा। तभी अच्छी तरह समझ आया कि ये झूठे भेद-भाव कर किस तरह व्यर्थ में हम अपना ही बुरा करते हैं क्योंकि वास्तव में आज प्रतीत हुआ कि यदि हम इकट्ठा रहें तो किसी भी संकट का आसानी से मुकाबला कर सकते हैं। हमारे इस आने जाने की जिद में लगातार बढ़ता वो जल स्तर मेरी कमर तक हो गया होगा ,अंदाज लगाया मैंने। हम धीरे धीरे सकुशल सुरक्षित पहुंच चुके थे। जहां बहुत सारे लोग इकठ्ठे दिखे तो अचानक मन का सारा भय उस संकट में तिरोहित हो चुका था। एक बड़ी सी ऊंची जगह पर सब ही एक दूसरे को जगह देते हुए ,मदद करते ,नम्रता से अपने बच्चों के साथ दूसरे के बच्चों को भी सम्हालते दिखे। सुखद आश्चर्य के साथ गर्व भी हो आया उन साथियों पर व उन बच्चों पर जिन्होंने हमें यहां लाकर सौहार्द का अनोखा पाठ पढ़ा दिया। हां----अभी हम तो शायद सुरक्षित हो चुके थे ,पर पानी लगातार गिरता जाता ,उसके रुकने के आसार अभी भी नही ,कमी नहीं । ओफ़ क्या बादल ही टूटकर गिर जाएंगे आज ,परिस्थितियां लगातार बिगड़ने के बाद भी हम सकून अनुभव करते हुए विकटता में भी सहज होने के प्रयत्न में। बीच शहर के अंदर भी क्या ऐसी सैलाब या बाढ़ आ सकती है। अविश्वसनीय होकर भी प्रत्यक्ष अनोखा प्राकृतिक प्रकोप ,जहां हर संसाधन पास होकर भी इस वक्त किसी काम के नही लग रहे तब भी सावधानी से कदम बढ़ाते ,कभी लगता समय थम सा गया हो । ओफ़--। तेज हवा अभी भी गुस्सा जाहिर करती नजर आती। उन दो ढाई घंटों में बस्ती के लगभग सभी बच्चें,बुजुर्ग ,महिला व अन्य लोग सही सलामत एक जगह एकत्रित। वशुबाई , आनंदी ,जहीर को सही जगह लाते उन वीर बच्चों का उत्साहित दल ,तभी किसी की गूंजती आवाज ,”कमलाबाई उनके छोटे बच्चे व वहां छूटे खान भाई को सम्हालो”। आसमान की चमकती बिजली में सबने उनको देखा कितने प्यार से सम्हालकर सबको ऊंचाई पर लाते। तभी उस अंधेरे में सबने पुनः पानी का बढ़ता रौद्र रूप देखा व देखा कि सबको बचाकर लाते उन लड़कों में से किसी का बैलेंस बिगड़ा ,दूसरों को पकड़ा उसका हाथ छूटा व एक पल में हमारे सामने ही वो विलीन हो गया । घोर अंधेरे में भी सबने देखा कि पलक झपकते ही वो नजरों से ओझल हो चला । साथ के दूसरे बच्चों की सम्मिलित जोरों की आवाज -----ने सबको झिझोंड दिया ,अरे भाई का हाथ छूट गया ,ओ ! वो गढ्ढे में फंस गया ,बह गया ,कहाँ चला गया ----”दौड़ो ! अरे----रोहित ,अमन ,साहिल ,अरशद -----दीपक भाई को पकड़ो-------खींचो पानी से निकालो।” चारों तरफ के लगातार बढ़ते उस शोर ने अनायास सबको चैतन्य कर दिया ,दूर होती घबराहट पुनः दिल दहलाने लगी। अनेक आवाजें ,बड़ी चीखों ने माहौल को तब पूर्ण गमनीन बना दिया ,जब पता चला कि सबका कर्णधार बना वो लड़का दीपक अचानक पानी की धार व उसके उफान में बह गया है व हाथ नही आया। अब समझ आया कि इतनी बड़ी मुसीबत में वह और उसके सभी देवदूत साथियों ने क्या कार्य कर डाला है। अपनी जान की परवाह न करके सारी बस्ती की रक्षा की है। ओफ़ ! हजारों की भीड़ में भी सन्नाटा छा गया ,ढूंढने खोजने के उस उपक्रम में अब तक उजाला प्रतीत होने लगा ,आकाश में रोशनी के साथ मौसम कुछ खुलने से लगा। वे बच्चे ही नही अब तक वहां उपस्थित सब आबाल ,वृद्ध ,महिला ,पुरुष बिना किसी से कुछ कहे उस फरिश्ते को खोजने में जुट गए जिसने अपने साथियों के साथ मिलकर सबकी जान बचाई थी। पर------- वो नही मिल पाया ,मिला तो कुछ दूरी पर उसका शरीर ,जीवित भी नही पर उसके जाने के बाद ही लोगों ने उसे शायद अच्छे से देखा ,उसके दर्शन कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। *ओह ! दीपक क्या तुम केवल देवदूत बनकर हमारे संकट हरण हरने आये ,अपने व अपने दोस्तों के साथ तुमने हमें बता दिया कि पाश्चात्य होकर नई टेक्नोलॉजी में रची बसी हमारी नई पीढ़ी कितनी जागरूक है । अपने परिवार के साथ समाज को भी गर्वित करने में सक्षम है।* –----–---------------------------------–--------------------------------------------------------------------------------------------- ये मेरी स्वरचित कथा है। प्रतिलिपि क स हेतु प्रेषित। कहानी लेखिका -- श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल 4723/66 पी , जे पी नगर ,विजय चौक ,अधारताल ,जबलपुर म प्र 284002 –--------------------- दिनांक 16 जुलाई 2018 ,

Tuesday, June 28, 2016

भारत माता की आरती

भारत माता की आरती सिर पर हिम गिरिवर सोहे ,चरण को रत्नाकर सोहे देवता गोदी में सोए ,रहे आनंद होए न द्वंद ,समर्पित छंद ! बोलो जय बुद्धि प्रदाता की.१. आरती भारत ----- जगत से लगती यह न्यारी ,बानी है इसकी छवि प्यारी के देख दुनिया जले साडी ,देख कर झलक , झुकी है पलक ,बड़ी है ललक ! कृपा बरसे जहाँ दाता की .२. आरती भारत ----- गोद में गंगा जमुना लहरें, के भगवा फहर फहर फहरें . लगे हैं घाव बहुत गहरे ,हुए हैं खंड ,करेंगे अखंड ,देकर दंड ! मौत दु:खदाता विदेशी की.३. आरती भारत ----- पले जहाँ रघुकुल भूषण राम ,बजाये बंशी जहाँ घनश्याम. जहाँ के कण कण तीरथ धाम . पले हर धर्म, साथ शुभ कर्म ,लड़े बेशर्म. गूंजे धुन राम विधाता की.४. आरती भारत ----- बढे हिन्दू का स्वाभिमान ,किया केशव ने जीवनदान . बढ़ाया माधव ने सम्मान , चलेंगे साथ ,हाथ में हाथ ,उठकर माथ ! शपथ गीता गौमाता की .५. आरती भारत ----- संकलित--श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल Definition for Zoology Z

छोटे से नेपा की प्यारी कहानी.

अमूल्य यादें आओ सुनाती हूँ तुमको कहानी,छोटे से नेपा की प्यारी कहानी. अद्भुत थे वे पल-छिन-दिन और मीठी न्यारी थी सबकी वो बानी . कुछ स्वर्णिम यादें जिन्हे अपने तरीके से संजोकर अपने नेपानगर वासियों को अर्पित करना चाहती हूँ .जिन सुखद दुर्लभ यादों को स्मरण करके ही आज आँखों में आंसू आ जाएँ ,इसे हम क्या कहें. आज वरिष्ट जनों की श्रेणी में हमने कदम रख लिया है पर फिर भी हमारे बचपन का वो मधुर संसार तो वैसा का वैसा ही लिपिबद्ध होकर श्रंखला के स्वरुप में उमड़-घुमड़ कर समक्ष आते जाता है. आप व हमारे ऐतिहासिक नेपानगर से बाहर निकलकर अधिकांश नेपावासी अपनी अपनी योग्यतानुसार पढ़कर बढ़कर सुदूर स्थापित हो चुके हैं.चाहे स्वदेश हो या परदेश. अपने *ग्रहदेश* का नाम सुनते ही दौड़कर पहुँचने को आतुर हो उठते हैं .वही अपनापन ,प्यार,संस्कार,दुलार,प्रिय व्यवहार,मधुर-शीतल निःस्वार्थ वाणी का अनोखा संसार करतल ध्वनि से स्वागत करता प्रतीत होता है. न तो कोई ए..टी.एम.,न एंड्रॉयड मोबाइल न कोई कैमरा ,न फोटो , न मॉडर्न बाइक ,न स्कूटी ,न आज जैसी कोई आधुनिक सुविधा उपलब्ध ,कार आदि सोची ही नहीं जा सकती. ,साधारण साइकिल भी कम दिखती. पर लगभग हर बच्चा अपने स्कूल का नियमित विद्यार्थी, घर के अभिभावक उनकी शिक्षा के लिए निश्चिन्त व कक्षा में पढ़ाये जानेवाले शिक्षकों की वो अनमोल आत्मीयता. प्रतिदिन का गृहकार्य सदा पूर्ण . कोई पिछड़ न जाये ,कोई कम अंक लाया , तो क्यों? अनुत्तीर्ण हो गए तो शामत ही समझो. यानि पाठशाला कम घर जैसा माहौल ज्यादा. पिकनिक जाना हो ,स्नेह सम्मलेन मनाना हो तो, सामूहिक भोज हो ,खेल कूद की प्रतियोगिता हो या भाषण ,वाद-विवाद सब कुछ स्कूल मे..अपने आत्मीय शिक्षकों के साथ. जहाँ बच्चों के माँ-पिता भाई बहिन भी सब बराबरी से साझा करते. नेपानगर के आस पास की कोई नदी -तालाब -जीर्ण-शीर्ण मंदिर या वहां के सतपुड़ा के जंगलों व छोटे गावों में भी सामूहिक पिकनिक के साथ सबके द्वारा मिलकर बनाया भोजन ,खेलकूद,अंत्याक्षरी ,गाना बजाना, नृत्य नाटक कुछ भी नहीं छूटता. मीलों दूर की नदी या कोई जगह रहे ,सारे स्कूल के विद्यार्थी पैदल गाते बजाते चलते जाते.कोई व्यक्तिगत समस्या हो या शारीरिक कष्ट सब एक दूसरे के लिए नि:स्वार्थ तत्पर.कोई आर्थिक,जातिगत भेदभाव नहीं सबके साथ समान व्यवहार....सब एक सुंदर परिवार,सब आपस में जुड़े ,बड़ों के लिए सम्मान छोटों के लिए स्नेह. काफी ज्यादा विद्यार्थी संख्या होने पर भी लगभग एक दूसरे की जानकारी रहती.कैसा अनोखा परिवार रहा है हमारा ,इसीलिए आज भी अपना अनूठा बचपन नेपानगर में बिताये लोग अपना वही प्रिय संसार-संस्कार व वाणी की सतत मधुरता ढूढ़ते रहते हैं.. नेपानगर की वर्तमान की जागरूक हमारी आज की पीढ़ी ने भी इतनी सुन्दर वेबसाइट की शुरुआत करके अपना इंट्रेस्ट जाहिर कर दिया है. इस सांस्कृतिक कला केंद्र के माध्यम से मुझे लगा ,मैं भी अपनी कुछ स्मृतियाँ शेयर करूँ .आप सब के साथ .निश्चित मानिये उस समय की अनेकों अद्भुत स्मृति संग्रह को पढ़कर सबको बहुत अच्छा लगेगा चाहे एक सुन्दर कहानी पढ़ने जैसी ख़ुशी व उत्सुकता रहे. कुछ क्रम से आप पढ़ेंगे तो ---------- 1-----

Friday, April 24, 2015

मेरा आँगन -------माँ-पिता .बाबा,पापा के लिए विशेष

मेरा आँगन -------
अभी उस दिन माँ से मिली मैं ,डबडबाई आँखों ने किया स्वागत मेरा।
सशक्त वटवृक्ष  थे पिता मेरे ,ये शिथिलता ने कैसे डाल  दिया था डेरा।
दोनों मौन हैं ,कुछ उदास व्यथित भी ,पर मुस्कुराहट को नहीं है बिसारा।
खुली  किताब ही तो बना रहा ,बीता प्यारा,उनका जीवन सुन्दर  सारा।  
पिता मेरे बहुत हैं मुझको प्यारे ,इस लाड़ली को दिया अधिकार,सहारा। 
मेरी अच्छी -बुरी गलती रही हो ,तब भी कभी नहीं था मुझकों  नकारा।
मुझे याद नहीं पर माँ ने बताया ,उन्ही ने किया था स्वागत मेरा प्यारा।
जिगर के अपने इस टुकड़े को सींचा लहू से ,कभी नहीं था  धिक्कारा।
बाबुल की गलियों में खेली-पली-बढ़ी ,अब भी सपनों में रहती हूँ उनके।
माँ की डाँट -मार -फटकार खाई,असीम अबूझे प्यार को भी देखा उनके।
जिस जमीन पर अब खड़ी हुई  हूँ ,नित नया क्षितिज छूती जा रही हूँ।
मन के कोने-कोने में आश्वस्ति है ,समग्र स्नेहाशीष पाती  जा रही हूँ.
जीवन में जो चाहा पा लिया है , सुन्दर नयी कल्पनाऐं सजा रही हूँ।
मेरे हर ख़ुशी-गम उनके ही साहस से , कदम बढ़ाते  मुस्कुरा रही हूँ.
हाँ अपना मन उनके आँगन में रहने तक कभी नहीं उलीच पायी मैं।
कैसी हूँ बेटी - दुहिता  होकर भी उनका प्रतिकार नहीं कर पायी मैं.
याद है मुझे ,मेरा वो जिद करना ,देखा था जहाँ नित एक नया सपना।
कैसे खो गए वो पल-छिन ,जहाँ मेरा था बस मेरा हर दिन वो अपना।
माँ के आँचल की वो भीनी खुशबू ,पिता के लाडो  की छोटी सी दुनिया।
फूलों सी बिटिया को पाला - माना , कभी न लांघी मैंने उनकी बगिया।
अपने क्लान्त हाथों से ,अपने जीवट भर ,मेरे बेटी होने पर भी।
नहीं किया कोई भेद कभी माँ-पिता ने हम भाई -बहिनों मैं भी।
ज़माने ने कहा परायी, बेटी  हूँ  तो क्या ,समझती मन को उनके।
क्यों हैं व्याकुल ,कैसे हैं दुखी,किस तरह सपने कसकते हैं उनके।
हो तो नहीं सकती कभी उऋण, पर चाहती हूँ कुछ सुख उनको देना।
कर वृद्ध-शिखर चरणों का सत्कार,पाऊँ उनके स्वर्ग का एक कोना।
और ससुराल के लिए----,
मन को मेरे बना दिया है इतना सुदृढ़ ,दे रखे हैं सुसंस्कृत संस्कार।
जाओ बेटी जहाँ भी ,पाना उनका प्यार, न भूलना अपने सुविचार।
तुमने हमसे पाया जो भी दुलार ,नए जीवन में बस बाँटना वो प्यार।
न बिसराना ,मिलेंगे वहां माँ-पिता ,भाई-बहिन ,रखना सद्व्यवहार।
आज गर्व है  मुझे  बहुत ,जब भी मिलते हैं माँ-पिता मेरे अपने ।
पाते हैं उनकी बिटिया को वैसी ही ,जिसके देखते रहे हैं वे सपने।
मन की आँखें खुली रहें ,बनी रहूँ नतमस्तक भी,न हो कभी अहम कोई.
बस यही चाहत है,स्वप्न में भी न हो कभी मेरे द्वारा मलाल उन्हें कोई।  
अलका मधुसूदन  पटेल 


अलका मधुसूदन  पटेल