Friday, April 24, 2015

मेरा आँगन -------माँ-पिता .बाबा,पापा के लिए विशेष

मेरा आँगन -------
अभी उस दिन माँ से मिली मैं ,डबडबाई आँखों ने किया स्वागत मेरा।
सशक्त वटवृक्ष  थे पिता मेरे ,ये शिथिलता ने कैसे डाल  दिया था डेरा।
दोनों मौन हैं ,कुछ उदास व्यथित भी ,पर मुस्कुराहट को नहीं है बिसारा।
खुली  किताब ही तो बना रहा ,बीता प्यारा,उनका जीवन सुन्दर  सारा।  
पिता मेरे बहुत हैं मुझको प्यारे ,इस लाड़ली को दिया अधिकार,सहारा। 
मेरी अच्छी -बुरी गलती रही हो ,तब भी कभी नहीं था मुझकों  नकारा।
मुझे याद नहीं पर माँ ने बताया ,उन्ही ने किया था स्वागत मेरा प्यारा।
जिगर के अपने इस टुकड़े को सींचा लहू से ,कभी नहीं था  धिक्कारा।
बाबुल की गलियों में खेली-पली-बढ़ी ,अब भी सपनों में रहती हूँ उनके।
माँ की डाँट -मार -फटकार खाई,असीम अबूझे प्यार को भी देखा उनके।
जिस जमीन पर अब खड़ी हुई  हूँ ,नित नया क्षितिज छूती जा रही हूँ।
मन के कोने-कोने में आश्वस्ति है ,समग्र स्नेहाशीष पाती  जा रही हूँ.
जीवन में जो चाहा पा लिया है , सुन्दर नयी कल्पनाऐं सजा रही हूँ।
मेरे हर ख़ुशी-गम उनके ही साहस से , कदम बढ़ाते  मुस्कुरा रही हूँ.
हाँ अपना मन उनके आँगन में रहने तक कभी नहीं उलीच पायी मैं।
कैसी हूँ बेटी - दुहिता  होकर भी उनका प्रतिकार नहीं कर पायी मैं.
याद है मुझे ,मेरा वो जिद करना ,देखा था जहाँ नित एक नया सपना।
कैसे खो गए वो पल-छिन ,जहाँ मेरा था बस मेरा हर दिन वो अपना।
माँ के आँचल की वो भीनी खुशबू ,पिता के लाडो  की छोटी सी दुनिया।
फूलों सी बिटिया को पाला - माना , कभी न लांघी मैंने उनकी बगिया।
अपने क्लान्त हाथों से ,अपने जीवट भर ,मेरे बेटी होने पर भी।
नहीं किया कोई भेद कभी माँ-पिता ने हम भाई -बहिनों मैं भी।
ज़माने ने कहा परायी, बेटी  हूँ  तो क्या ,समझती मन को उनके।
क्यों हैं व्याकुल ,कैसे हैं दुखी,किस तरह सपने कसकते हैं उनके।
हो तो नहीं सकती कभी उऋण, पर चाहती हूँ कुछ सुख उनको देना।
कर वृद्ध-शिखर चरणों का सत्कार,पाऊँ उनके स्वर्ग का एक कोना।
और ससुराल के लिए----,
मन को मेरे बना दिया है इतना सुदृढ़ ,दे रखे हैं सुसंस्कृत संस्कार।
जाओ बेटी जहाँ भी ,पाना उनका प्यार, न भूलना अपने सुविचार।
तुमने हमसे पाया जो भी दुलार ,नए जीवन में बस बाँटना वो प्यार।
न बिसराना ,मिलेंगे वहां माँ-पिता ,भाई-बहिन ,रखना सद्व्यवहार।
आज गर्व है  मुझे  बहुत ,जब भी मिलते हैं माँ-पिता मेरे अपने ।
पाते हैं उनकी बिटिया को वैसी ही ,जिसके देखते रहे हैं वे सपने।
मन की आँखें खुली रहें ,बनी रहूँ नतमस्तक भी,न हो कभी अहम कोई.
बस यही चाहत है,स्वप्न में भी न हो कभी मेरे द्वारा मलाल उन्हें कोई।  
अलका मधुसूदन  पटेल 


अलका मधुसूदन  पटेल 

Friday, April 8, 2011

नारी.....एक आन्दोलन ....उत्कर्ष व संघर्ष का

प्रिय वाणीजी
"नारी" ......एक आन्दोलन..... उत्कर्ष व संघर्ष का.....
सर्वप्रथम हम सबकी शुभकामनाएँ व बधाइयाँ नारी ब्लॉग के उत्कृष्ट तीन वर्ष पूर्ण करने के उपलक्ष्य में. रचनाजी ने इसे प्रारम्भ किया और कारवां बढ़ता गया ,उनको भी साधुवाद.
आपकी अच्छी पोस्ट पढ़ी. वास्तविकता यही है कि आज भी एक लड़की -महिला की परिवार में समाज में दोयम की स्थिति ही है. एक बच्ची के साथ बचपन से ही हमें हमारे परिवार में ,पास-पड़ोस में ,समाज में सभी जगह तो रोज ही भेदभाव ,उत्पीडन, शोषण ,मानव अधिकार हनन देखने मिल रहा है. चाहे जिस रूप में हो. हाँ परिस्थितियां बदल रही हैं ,जाग्रति आ रही है नारी अपने अधिकारों व सम्मान के लिए सचेत हो रही है पर उसकी आवाज अब भी दबा दी जाती है. स्वाभाविक है देखकर-सुनकर मन कचोट उठता है.
अपनी प्रिय पंक्ति पुनः दोहराना चाहूंगी.
गहरा है अँधियारा... अब दिया जलाना है. हमको तुमको सबको अब मिलकर आगे आना है.
नारी ब्लॉग में विचार प्रेषित(लिखने) करने के साथ-साथ सारे समाज में भी जहाँ भी नारी सम्मान या गलत भेदभाव की बात समक्ष आए अपनी आवाज बुलंद करनी है.
और आगे बढ़ते जाना है.अपनी पहचान-अपनी शक्ति पहचानना होगी.
पुनः आपको सार्थक पोस्ट की बधाई.
अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका-साहित्यकार

Friday, March 26, 2010

भारतीय संस्कृति व संस्कारों का पूर्ण मान-सम्मान

प्रिय रचनाजी ,
आज भी भारतीय संस्कृति व संस्कारों का पूर्ण मान-सम्मान सारे विश्व में होता है. हमारे देश की सभ्यता का उदाहरण दिया जाता है. हमारे समाज या परिवार कितने भी आधुनिकता या पश्चिमी संस्कृति की ओर बढ़ें पर कुछ बातों को अब भी उचित नहीं समझा जाता.
इतिहास साक्षी है जिन सामाजिक नियमों -कानूनों को गहन चिंतन-मनन के बाद हमारे मनीषियों - विद्वजनों ने समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए निर्धारित किया है व सदियों से चलते आ रहे हैं. हम-हमारे परिवार भी इनमे बंधकर ही पूर्ण सुरक्षित व निश्चिंत हैं.
अब मुख्य सोच का विचारबिंदु यही सामने आता है कि भारतीय समाज में भी आखिर क्या कारण ऐसे बन गए हैं कि हमारे देश के सर्वोच्च सुप्रीम/हाई कोर्ट तक को ऐसे जजमेंट लेने पड़ें हैं. निःसंदेह विचारणीय है कि आज कि सामाजिक परिस्थितियों को देखकर ही हमारे माननीय जजों को ऐसे निर्णय देने पड़े हैं . अमान्य को मान्य नहीं किया जाता तो भी ये सब कुछ तो हो ही रहा है हाँ अब खुलकर सामने होगा. दूरगामी द्रष्टि से विचार करने के लिए बाध्य तो कोई नहीं है पर कुछ नजर तो आ ही रहा है. गंभीर चिंता है कि क्या कल भी यही सामाजिक सुरक्षा बनी रह पायेगी ? कानून से कितने लोग डरेंगे ,क्या पालन करेंगे ?अपने असंतोष को कैसे व कहाँ व्यक्त करेंगे?
बहुत चिन्त्तनीय विषय है शायद क़ानूनी सहायता भी न मिल पाए. सामाजिक मूल्य तो कम होंगे ही.
अलका मधुसूदन पटेल
लेखिका -साहित्यकार
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